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जुलाई, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Hemraj sarswat

गालिब उनका भी था फिर भी हवा का रूख बदल गया! चाहत की वो आरजू क्या थी फिर भी तन्हा सफर था! उनकी महफिल में हम क्या शरीक हुवे कुछ कुछ बदले बदले से लग रहै थे जब मुड़कर हमने दैखा उनको र...

Hemraj sarswat

वो आरजु हमारी थी या मैरी पनाह थी बहुत रोया है ये दिल जनाब मेरे आँखो के आँसू भी सुख गये है! ........................ क्या बताये हम अक्सर ये भुल जाते है हमारी मंजिल कहा है! कुछ लौग वो होते है जिनकी याद ...