गालिब उनका भी था फिर भी हवा का रूख बदल गया! चाहत की वो आरजू क्या थी फिर भी तन्हा सफर था! उनकी महफिल में हम क्या शरीक हुवे कुछ कुछ बदले बदले से लग रहै थे जब मुड़कर हमने दैखा उनको र...
वो आरजु हमारी थी या मैरी पनाह थी बहुत रोया है ये दिल जनाब मेरे आँखो के आँसू भी सुख गये है! ........................ क्या बताये हम अक्सर ये भुल जाते है हमारी मंजिल कहा है! कुछ लौग वो होते है जिनकी याद ...