Hemraj sarswat
गालिब उनका भी था
फिर भी हवा का रूख बदल गया!
चाहत की वो आरजू क्या थी
फिर भी तन्हा सफर था!
उनकी महफिल में हम क्या शरीक हुवे
कुछ कुछ बदले बदले से लग रहै थे
जब मुड़कर हमने दैखा उनको
रूख भी बदला महफिल का था!!
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ऐं दिल सम्भल जा जरा
तु है कौन इस महफिल मे
इतना भी नादान मत बन तु
गैरो की है यहा तन्हा महफिल!!
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क्या हुवा है इन जमाने को
हमारा इश्क भी आवारा सा बन गया
इतने जाम पिने के बाद भी हम
कतरा कतरा सा हम बदल गयें!!
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बात भी मत कर ऐं दिल तू
मुझे शाम की भी खबर नही
दिदार भी हम करें किसका
जिनका कोई एहशास नही!!
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नशरूदिन भी क्या फरमाई
कवि हेमराज सारस्वत ने
तालिमे भी बेमतलब भी की
जैसे बिन बादल के बरसात थी!!
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आरजू की आड़ मे
जलाई हमने दिपक की परछाई
कम्बक्त उनका हुस्न का था
जो दिपक की वो परछाई थी!!
बहुत थक सा चुका हु मे
ऐं जिन्दगी तेरी नौकरी से
अब तो तु मुझे अपना हिसाब दे दे
या मेरी नूर का दिदार देदे!!
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जालिम अगड़ाई भी क्या बला थी
जो याद आती उनकी तो आ जाती
जब वो बंद होती तो
मानौ महफिल मे कमी उस फिजा की थी!!
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~हेमराज सारस्वत
लालमदेसर मगरा
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