Hemraj sarswat

वो तन्हा मंजर था
जो देखा था हमने
पीपल के पत्ते गिर रहे थे
कसूर किसका था!
शायद कसूर हवाओं का था
या बेदर्द पतझड़ का था
फिर भी जा जाने क्यों
वो सितम किसका था!!
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बड़ी रुस्तम वो हवा थी
जो अपनापन हमरे मन में था
जो होकर भी अपना ना हो
रुस्तम वो गुल हयात था!
सितम कर गए वो
जो कल तक अपने थे
फर्क है उन हवाओं का
जिनके दर पर सावन था!!
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कैसा समा है ये
दीपक जला भी ना था
इन फिजाओं का रुसवा भी देखो
सिर्फ उनका सितम था!
सामना हुवा था उन जालिम का
बेचारा दीपक ही तो था
सुर है! पर सुनने वाला कहा था
क्या वो तराना था!!
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कुछ सितम लिखा है
कवि हेमराज ने सिर्फ दर्द ही तो था
सुनने वाले भी क्या अल्फाज था
जो सुन भी सका था!
क्यों रुसवा एं बादल
कुछ तो तू वजह बता
ज़ुल्म हूवा था तुझपे या
मौसम का इशारा था!!
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हर तन्हाई में तन्हा थे हम
और धूप का पहरा था
सोचा कुछ पल छाया में गुजारे
रुसवा भी तो लू का था!
मन से हारा तन से हारा
क्यों में  दिल से नहीं हारा था
लिखत कवि हेमराज यहां
सिर्फ वो सितम हवाओं का था!!
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#हेमराज सारस्वत
Lalamdesar magra

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